गीतिका संग्रह — पृष्ठ 40
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- विनत हो हम करते शासन का सम्मान।।
- विनय
- विमल—विवेक
- विरल व्यक्तित्व
- विरोध
- विवेक का मोती
- विश्राम लो, मत विश्राम लो
- विश्व के आलोक लो अभिवन्दना,
- विश्व को नव आलोक मिले
- विश्व क्षितिज का
- विश्व शांति के अग्रदूत हे श्वेत संघ सेनानी!
- विश्व-मंच पर नई क्रान्ति की
- विश्वमैत्री की दिशा में हम कदम आगे बढ़ाएं।
- विश्वास
- विश्वास दीप
- विष की कटुता अमृत की मधुमयता बतलाती है
- विष को हँस-हँस पीते जाओ
- विषयों की ज्वाला
- वीतराग ! भव पार करो
- वीर की पावन जयन्ती को मनाये हम
- वीर के अनुगामी भिक्षु-स्वामी के गुण गाएंगे,
- वीर प्रभु! सुणो नी पुकार,
- वीर भिक्षु अभिवंदन शत-शत
- वीर भिक्षु के चरण
- वीर मेरी चादर मैली
- वीर सुणो मोरी वीनती
- वीर हो महावीर हो तुम करूं शत-शत वन्दना,
- वीर! तेरी वाणी को हम सुमरें,
- वीर! तेरी वाणी को, घर-घर पहुंचायेंगे,
- वीरं भज रे!
- वीरजी म्हारे घर पे पार्या रे,
- वृक्ष तणो ज्यूं पाको पानड़ों रे
- वृक्ष धरा के हैं आभूषण।
- वे कितने हैं?
- वे धन्य है
- वेगा पधारो गुरुराज! पलकां स्यूं पंथ म्हैं बुहारां।
- वैराग्य से कल्याण
- वो सबको प्यारा है, त्रिभुवन तारा है,
- व्यसनों से जीवन होता बरबाद
- व्रत से उत्तम बनता जीवन।
- शक्ति लगाओ नये वश।
- शक्ति संवर्धन करना है
- शक्ति-पीठ
- शत-शत अभिनंदन—३
- शत् शत् वंदन
- शद्धा-सुमन
- शबनम की जंजीरें
- शरण ले लै रे, धर्म रो शरण ले लै रे,
- शरणो गुरुर रो,
- शलभ! तेरी जिन्दगी का मूल्य दीपक आंकता कब?
- शान
- शान्ति का आधार
- शान्ति विधायक शान्ति जिनेश्वर, प्रातः मैं उठ कर ध्याऊं
- शासण ओ भिक्षु रो सुरगां स्यूं है प्यारो
- शासन आपां रो,
- शासन कल्पतरू
- शासन की शान हो, नेता महान् हो,
- शासन प्यारो रै,
- शासन रखवारे, जन-जन के
- शासन रा सम्राट्, मुखड़ो लागै प्यारो जी,