गीतिका संग्रह — पृष्ठ 46
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- सुणल्यो थे किसान भाई ! गुरु री शिक्षा हितकारी,
- सुणल्यो श्रावकजी भावां नै राखीज्यो नित उजला,
- सुणिये भवि! भल भाव स्यूं रे, भिक्षु लिखत महिमाण।
- सुणो श्रावकां ध्यान स्यूं अवसर री आवाज,
- सुधा किसी को मिल पाए तो
- सुन जरा कट जाये
- सुनकर, यह मेरा स्वर, दिल के आग्रह को दो हर,
- सुनाएं फिर से वह सिंहनाद।
- सुनें कहानी परमपुरुष की, तेरापंथ की,
- सुनो अहिंसा का आह्वान
- सुनो कहानी कनकप्रभा री
- सुनो प्यारे प्रभुवर, भाव हृदय के,
- सुनो बालकों! एक कहानी,
- सुनो भगवान्! मेरे अरमानरे, दो ध्यान मिट जाए अब अज्ञान,
- सुनो लगाकर ध्यान, सुगुरु की वाणी,
- सुमिरन प्रभु का कर ले, मनवा!
- सुर नर जिणने शीश नमावै,
- सुरक्षा ही असुरक्षा
- सुहाता नहीं मुझे व्यवहार
- सूना-सूना लगता संसार, भगवन्! बिना आपके,
- सूरज आया है, उजली छाया है, मिलेगा जग को उजियाला,
- सूरज जैसा ओज है
- सेनानी
- सेवा करो सफल बनो
- सेवा का दो अवसर आए द्वार तुम्हारे—हम द्वार तुम्हारे।
- सो ही सयाणा! नेम चितारै
- सोते—उठते, खाते—पीते होठों पर इक नाम,
- सोना रूपा रो रवि (स्वागत-गीत)
- सोने स्यूं घड्यो है, दिन आज रो।
- सोया गफलत में क्यों सयाने कीमती यह समय खो रहा,
- सोरठा
- सोरठा
- सोरठा
- सोरठा
- सोरठा
- सोलह सतियों का गीत
- सोलह सती स्तवन
- सोवण में जमारो बीत्यां जाय, अब तो जाग रै।
- सौभागी संघ हमारा
- सौभाग्य घड़ी जिन-शासन की,
- सौरभ थांरे संघ री, पूगी क्षितिज रे बीं पार।
- स्थापना दिवस
- स्थिर बन सामायिक कर लो
- स्थिर रहता विश्वास
- स्नेह
- स्मृति-रंग
- स्रष्टा से
- स्वच्छ भारत गीत
- स्वत्व
- स्वप्न संसार में भाई
- स्वभाव
- स्वयं का ध्यान लगाऊंगा
- स्वरूप चिन्तन
- स्वर्ग तरसता धरती खातिर
- स्वर्णिम अवसर
- स्वर्णिम है यह सवेरा आनन्द हम मनाएं।
- स्वस्थ चिंतन
- स्वागत
- स्वागत गीत
- स्वागत गीत