गीतिका संग्रह — पृष्ठ 7
2856 में से 361–420
- आयो महावीर रो हेलो।
- आरती उतारां
- आरती उतारां म्हैं तो त्रिशला रै लाल री
- आरती उतारूं बाबै मिखणजी री भाव स्यूं,
- आरती तेरी गाऊं सुबह शाम मैं,
- आर्य भिक्षु जनमे जिस युग में, खुले नए आयाम रे,
- १९, आलोक का हाट
- आवो सब रै सागै मैत्री आपां करल्यां जी, करल्यां जी,
- आशा
- आशा का गगन, सपनों का चमन,
- आशीर्वाद तुम्हारा
- आश्वासन
- आसमां रा चांद तारा
- आस्था दो हे स्वाम! संघ तरुवर सरसाओ है।
- आस्था रा अनुपम दीप जल्य़ा
- आस्था रा अनुपम दीप जळ्या,
- आहारशुद्धि व व्यसनमुक्ति
- इक्षु रस के जैसा
- इच्छा परिमाण
- इतना मत खीचों
- इतरो कांई गर्व्यो रे
- इतिहास के आंसू
- इन्सानियत के पथ कदम बढ़ाना,
- इन्सानियत के पथ पर निर्मय सदा चलेंगे
- इन्साफ की डगर पे, अपने कदम बढा़ना,
- इस जीवन को पावन बनाते चलो तुम,
- इस दुनिया में आकर तूं ने सत्कर्म किया क्या जीवन में,
- इस भरे दरिया में कोई भी किनारा न मिला,
- इस भौतिक दुनियां में
- ई तन रो पल रो भरोसो नहीं
- ई भव-सागर रो किंयां किनारो निजरां आसी?।।
- ईर्या समिती में सजन रहो
- उजला प्रभाल आया, है अंगना हमारे।
- उजले पल उजली दिशाएं हैं, दर्शन पा हम हरषाए हैं।
- उज्ज्वल शासना तेरी
- उठ जाग थारो जीवन सूं ही बीत्यां जा रयो,
- उठ जाग रे
- उठने वाला डेरा
- उठो जवानो
- उठो!
- उड़ रहा पाखी गगन में
- उडा़न —
- उड़ान —
- उड़ान कालजयी व्यक्तित्व नै वंदन शत शत वार
- उड़ान-आंखों में बसी है मूरत, प्रभुवर की मनहारी,
- उड़ान-ओ तन माटी रो दियो, जलै ज्ञान री ज्योत,
- उड़ान-ओ वसुधा के उजियारे, जिन शासन गगन सितारे,
- उड़ान-गुरु नाम, सुख धाम,
- उड़ान-गूंज रह्यो दिग् दिगन्त में, तुलसी रो जय नाद,
- उड़ान-गूंजे जय नारों से गगन धरा रे,
- उड़ान-घर पे तुम्हारे चाहे धन की हो भरमार।
- उड़ान-छाया है अज्ञान कुहासा, खोया निज आकार,
- उड़ान-जीवन है दिन च्यार रो, कुछ तो करो विचार,
- उड़ान-नाम है प्यारा, जग उजियारा, अन्तर्तिमिर मिटाए रे,
- उड़ान-पाया तूं ने s s तम में उजाला।।
- उड़ान-प्रभु भगति में है रंग्या, रोम-रोम अरु प्राण।
- उड़ान-फैले सकल जहान में मैत्री की भावना,
- उड़ान-वीर नाम है मुझको प्यारा, नित उठकर मैं ध्यान धरूं।
- उड़ान-संघ अपना प्राण है, संघ है अपनी शरण,
- उड़ान-हर्ष घन उमड़ रहा, भक्ति जल उछल रहा,