गीतिका संग्रह — पृष्ठ 12
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- खंडहर
- खड़ा तेरे द्वार नाथ मुझको संभारो
- खड़ी पुकारै मौत बारणै,
- खतरा है राही
- खबर इक पल की नहीं, बिछुड़ जाता सब यहीं,
- खाद्य संयम करले प्राणी
- खाद्य संयम दिवस
- खाद्य—संयम दिवस
- खाना जहर है
- खाने में संयम
- खिम्या कियां सुख पामिये
- खिलग्यो दुगुनो ओ दरबार
- खुद की पहचान
- खुद पर भरोसा है तो, परीक्षा से क्यों तूं डरे,
- खुलै द्वार रो बण्यो पींजरो ,
- खुशियों का मेला लगा आंगन, पल आए ये पावन।
- खुशियों की धारा
- खोल आंखे खोल, क्यों तूं है सो रहा,
- गगन हरस घन छायो
- गण की आंखों के तारे भिक्षु! जन-जन के प्यारे भिक्षु!
- गण के आदिम-पुरुष! प्रणाम, पौरुष के प्रतिरूप! प्रणाम,
- गण नन्दनवन पा हरसावां
- गण रखवालो
- गण है हमारा
- गण-उपवन री मन्दार साध्वी कमलू जी
- गणदेव! मोरिया मन रा आज बुलावै आर्यदेव!
- गणधारी हो ब्रह्मचारी
- गणनायक गुरुवर महाप्रज्ञ चरणों में वन्दन करते हैं।
- गणनायक गौरवशाली
- गणाधिपति गुरुवर म्हारा लाखां आंख्या रा तारा
- गन्दी चीजें मत खाओ तुम।
- गफलत में मत खो मना, नहीं आछी पाछो हाथ
- गम खाणो, कम खाणो,
- गया अचानक इयां कियां म्हैं, सगला हुया उदास रे,
- गांठ हृदय की खोल
- गांधी के कमरे के अन्दर
- गाओ रे, गुरु गुण गाओ रे,
- गाड़ी चलती है छुक छुक छुक।
- गाती हूं मैं गीत तुम्हारे
- गाये जा, गाये जा रे, प्रभु गीत रे,
- गायेंगे तेरे गीत, जिनवर! सदा,
- गाली
- गावां, गावां, गावां म्हे तो, वीर गुण गावां हो
- गीत प्रेम के सब मिल गाएं
- गीतक
- गीतक छंद
- गीतक-छन्द
- गीतकार हो गया अगोचर
- गुण गौरव तुलसी का
- गुण ग्राहक
- गुण घुंघरू छम छमा छम – तपस्या री अनुपम महिमा
- गुण घुँघरू छम छमा छम – प्रभु महावीर विराजै रे
- गुण-मुक्ताओं की माला
- गुणस्थान-दिग्दर्शन
- गुणों की पूजा
- गुणों से महिमा
- गुरु अरु बहिनां रो संवाद
- गुरु का आशीर्वाद, सभी का मंगल हो,
- गुरु की छत्र छांव में, हुआ यह गण निहाल है।।
- गुरु को किया नमन कि मेरा दीप जल गया,